
बारात को समय था और मेरे मेहमान शादी की तैयारियां देखकर खुश हो रहे थे.
“वाह! एक अध्यापक भी इतने ठाट-बाट से तीन बेटियों का ब्याह कर सकता है भला! आप पर भगवान की बड़ी कृपा है दयालजी!” मेरे स्कूल की एक आध्यापिकाजी ने मुझसे कहा.
“सही बात कह रही हैं मैडम आप! दयालजी का जैसा नाम है वैसा ही काम है. कहीं भी वे कंजूसी नहीं करते. इन्होंने न जाने कितने ही गरीब बच्चों की फीस, कितनी ही बार जमा की है. सच ही तो है कर्म लौटकर आता है, बस ये सब आपके उन्हीं अच्छे कर्मों का नतीजा है दयालजी!” इस बार स्कूल के प्रिंसिपल साहब मेरी तारीफ़ कर रहे थे.
देखते-देखते बैंड-बाजे के साथ बारात आ गई. स्वागत सत्कार के बाद जैसे ही स्टार्टर्स शुरू हुआ, मुझे तुरन्त समधीजी की बात याद आ गई, “दयालजी! खाने-पीने का विशेष इंतज़ाम कर लीजिएगा और स्टार्टर्स-मीठे में आइटम बढ़ा दीजिएगा.”
मैं तमाम कामों के बीच मीठे के आइटम बढ़वाना और स्टार्टर्स बढ़वाना भूल गया था. समधी जी की बात याद आते ही सर्द हवा में भी मेरे माथे पर पसीने की बूंदे छलकीं.
“बारात आने से पहले सब एक बार ठीक से चेक कर लो दयाल, क्योंकि लाख ध्यान से एक-एक काम करो, पर शादी के कामों में कुछ न कुछ ज़रूरी काम छूट ही जाते हैं…” कानपुर वाली दीदी ने अभी अभी मेरे कानों में अपने यह अनुभवी शब्द डाले थे. पर तब क्यों मुझे यह जरूरी काम याद न आया?
अब इतनी जल्दी क्या करूं? हैरान-परेशान सा कुछ सोच ही रहा था कि मैं अपने सामने यह सब देखकर दंग रह गया कि मेहमानों को बीसों स्टार्टर्स परोसे जा रहे थे. मैं ये सब देखकर बड़ा अचंभित था.
मैं भागा-भागा कैटरिंग वाले के पास गया, तो वह करीबन दस तरह की मिठाइयों का स्टॉल लगवा रहा था. मैंने तत्काल उसे रोका, “नहीं भाई… नहीं… बस चार मिठाइयां ही रखो, मेरा इतना बजट नहीं.”
“बहुत बजट है सर आपका.”
नीली शर्ट में दुबला-पतला सा हैंडसम सा लड़का यह कहते हुए मेरे पैर छूने को झुका, तो मैं कुछ पीछे हटता सा बरबस उससे पूछ बैठा, “आप कौन?”
“आपका वही जलेबी वाला नील। जो फीस के बदले हमेशा आपको अपने पापा की दुकान की रस में डूबी वो जलेबियां दे जाता था. शायद आप भूल गए होंगे सर अपने इस पुराने स्टूडेंट को, पर मुझे आपकी अपने ऊपर की हुई एक-एक कृपा याद है. आप न होते तो मैं कैसे आगे बढ़ पाता?”
मैं उसका चेहरा उस छोटे से जलेबी वाले नील से मिलाने लगा, तो जैसे सालों बाद उसकी वो चाशनी में डूबी जलेबियों का स्वाद फिर से मेरे मुंह में घुल गया.
“आप जो कहें उसका स्टॉल लग जाएगा सर! और आप जितने चाहें, उतने पैसे दे देना सर! होटल के इस छोटे से मालिक यानी मेरे लिए सिर्फ आपका आशीर्वाद ही काफ़ी होगा. जैसे कभी स्कूल फीस के बदले आपके लिए मेरी लाई वो जलेबियां ही काफ़ी हुआ करती थीं.”
नील की बात सुनकर बरबस मेरी आंखें सजल हो उठीं और फिर से मेरे कानों में कानपुर वाली बड़ी दीदी की कही एक और अनुभवी बात आकर ठहर गई, “दयाल ! शादी-ब्याह में देने वाले बंद लिफ़ाफ़े वाला गुप्त व्यवहार हो या जीवन में किया जाने वाला खुला व्यवहार, एक दिन वापस ज़रूर आता है.“
स्रोत: हिंदी पत्रिका से कहानी के कुछ अंश…
PhD · e-Governance Specialist · Hindi Fiction Writer · Oracle & Python Expert
“Basically a Techie and a learner by heart — who still loves to learn new technologies, and finds in stories the truths that code cannot hold.”

