Story – मां की सहेली

रात में नींद नहीं आ रही थी। मां ने मुझे एक कहानी सुनाई। मां की भी मेरी तरह सहेलियां थीं, वो भी खेलने जाती थी। शाम को उनको भी नानी की डांट पड़ती थी। वो बिल्कुल मेरे जैसी ही थी।

जब मैंने मां से पूछा कि अब कहां गईं वो सहेलियां तो मां ने कहा न जाने कौन कहां होगी, हमारे वक्त संचार के साधन कम होते थे और जैसे ही हमारी शादी हुई हम सब दूसरे शहर, गांव चल दिए और अब शायद कभी वापस मिले भी और नहीं भी। तुम्हारी सहेलियां जीवन भर तुम्हारे साथ रहेगी।

मेरी सहेलियां तो बस अब नाम मात्र रह गई हैं। अगले दिन मैंने सोचा क्यों न मां को सहेलियों से मिलवाया जाए। मैं और बाबा दोनों गांव गए वहां उनकी सहेलियों के बारे में पूछताछ की, कौन कहां हैं, सभी से संपर्क करने की कोशिश की।

कुछ से संपर्क नहीं हुआ पर कुछ से हो गया। हम शाम को घर आए। मां के पास बैठे और मां को बोला, फोन आया है मां उठाओ तो जरा। मां ने उठाया और आवाज आई — “लीला मैं कांता! पहचाना?”

मां की आंखों में खुशी थी और मां उनसे बाते करते नहीं थक रही थी। मां की खुशी ने बता दिया किसी व्यक्ति के साथ संपर्क में रहना कितना जरूरी है।

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