Story – मन्नत

“चुप कर तू। ताई बड़ी माँ के समान होती है।” बचपन से लेकर मेरे बच्चों के बड़े हो जाने तक माँ से आज भी मुझे यही सुनने को मिलता है। ताई के खिलाफ माँ मेरे मुँह से एक शब्द भी नहीं सुन सकती और एक ताई हैं जो माँ को कुछ सुनाये बिना रह नहीं सकती। सब कुछ सुन सुना कर माँ मुस्कुरा कर बोल देतीं, “जी, जीजी आगे से ध्यान रखूँगी।”

हमारे घर अगल-बगल में ही हैं। एक-दो दिन में ताई हमारे घर का चक्कर लगा ही लेती। माँ के हर कम में मीन मेख निकालना और खुद का महिमा मंडन करना उन्हें खूब आता। हमारे घर की सारी खुशियाँ मानो उनकी मन्नतों की बदौलत ही आतीं।

“मैनें मन्नत मांगी थी ना।” बरसों से बस यही तो सुनता आ रहा था। मेरी दसवीं, बारहवीं, कॉलेज, नौकरी, शादी, बच्चे, तरक्की, नयी गाड़ी जैसे सबके पीछे उनकी मन्नतों का असर था। मेरे कर्म, मेरी मेहनत सब फिजूल।

आज तीन दिन बाद हॉस्पिटल से घर लौटा हूँ। ऐक्सीडेंट में बाल-बाल बचा। बिस्तर पर लेटा फ़ोन चला रहा था कि ताई की आवाज कानों में पड़ते ही झट से आँखे बन्द करके सोने का नाटक करने लगा। पता था अब वही अपना मन्नत वाला राग शुरु कर देंगीं। ताई करीब आयीं सिर पर हाथ फेरा। चेहरे पर गर्म बूंद सी महसूस हुई तो आँख खोलकर देखा, ताई की आँखों में आँसु थे।

“देख लो जीजी तुम्हारा लाडला एकदम सही सलामत है। अब तो मान जाओ।” ना जाने माँ ताई को किस बात के लिये मना रहीं थीं।

“देख लिया हो गई तसल्ली। बस आज एक बार और ‘उसके’ दर्शन कर लूँ। ताई माँ को समझाते हुए बोली।

“क्या बात है माँ?” मैं कुछ समझ नहीं पा रहा था।

“देख ना, जीजी तीन दिन से अकेले सुबह-शाम नंगे पाँव इतनी दूर वो नदी वाले मन्दिर जातीं हैं। पैरों में ये मोटे-मोटे छाले पड़ गये हैं मानतीं ही नहीं, अभी भी जाने को तैयार बैठी हैं।”

समझते देर ना लगी। ताई ने ये सब मेरे लिये किया और मैं ………। मेरी आँखों में आँसु भर आये। बदन से ज्यादा दिल दुख रहा था। बचपन से अब तक ताई को नारियल की तरह खुरदुरा और सख्त ही जाना। उनके अंदर एक नरम दिल भी धड़कता है ये तो मैंने कभी देखने को कोशिश ही नहीं की।

ताई बड़ी मुश्किल से माँ का सहारा लेकर बाहर जाने को खड़ी हुई ही थी कि मैंने पुकारा। “ताई एक मन्नत मेरी तरफ से भी माँग लेना।”

“बता क्या?”

“मेरी ताई की प्यार और आशीर्वाद से भरी सारी मन्नतें सदा यूँ ही पूरी होती रहें।”

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