
अगस्त के महीने का आखरी सप्तहा था। जयपुर शहर में उमस और बारिश की छिटपुट बौछारों के बीच रक्षाबंधन की तैयारियाँ जोरों पर थीं।
रतन अपने ड्राइंगरूम में बैठा मोबाइल स्क्रीन पर कूरियर का स्टेटस री-फ्रेश कर रहा था। ऐप पर साफ़ लिखा आ रहा था—‘इन ट्रांजिट’।
रतन ने ठंडी साँस भरी। उसकी बहन सुभद्रा ने सूरत से राखी भेजने में थोड़ी देर कर दी थी – त्योहार से महज़ दो दिन पहले लिफाफा बुक कराया था। बीच में एक दिन ईद की छुट्टी भी पड़ गई थी, इसलिए उसे पूरा यकीन था कि राखी त्योहार के दिन तक नहीं पहुँच पाएगी। आखिर त्योहार के इस छोटे से समय में तो हर कोई—यहाँ तक कि कूरियर वाले भी—अपनी बहनों से राखी बंधवाने अपने-अपने गाँव चले जाते हैं।
खैर, त्योहार तो मनाना ही था। रतन ने उसी शहर में रहकर पढ़ाई कर रहे अपने भांजे और भतीजी को घर बुला लिया। दिन की शुरुआत हमेशा की तरह हुई, लेकिन रसोई में आज कुछ खास पक रहा था। त्योहार की मिठास को दोगुना करने के लिए पारंपरिक राजस्थानी ‘दाल-बाटी-चूरमा’ की तैयारियाँ चल रही थीं।
सुबह के करीब 10 बज रहे थे कि अचानक दरवाजे की घंटी बजी।
रतन ने बाहर जाकर देखा, तो कंधे पर कूरियर का बड़ा-सा बैग टांगे एक बीस-बाईस साल का नौजवान लड़का खड़ा था।
“क्या आप रतन जी हैं?” उसने पूछा।
रतन ने जैसे ही हाँ में सिर हिलाया, उस लड़के ने एक कूरियर का पैकेट उनके हाथों में थमा दिया। लिफाफे पर बहन की लिखावट देखते ही रतन हैरान रह गया।
“अरे भाई! आज के दिन कूरियर? परसो तो ईद थी और आज राखी… मुझे तो लगा था कि अब यह पार्सल हफ़्ते भर बाद ही मिलेगा,” रतन के मुँह से सहसा निकल पड़ा।
कूरियर वाले लड़के ने एक बहुत ही शांत और हल्की सी मुस्कान के साथ जवाब दिया, “भईया, इस दुनिया में मेरा कोई परिवार नहीं है। न माता-पिता, न कोई बहन। कल तक सोच रहा था कि छुट्टी का दिन है, कमरे पर अकेले क्या करूँगा। फिर ध्यान आया कि हज़ारों बहनें अपने भाइयों के लिए कूरियर से राखी भेजती हैं, और कूरियर वाले छुट्टी पर चले जाएँ तो ये राखियाँ गोदामों में पड़ी रह जाती हैं। बस, इसीलिए मैंने आज एजेंसी से गाड़ी ली और सुबह सात बजे ही निकल पड़ा। ग्यारह बजे तक सारे पैकेट पहुँचा भी दूँगा।”
उसकी आवाज़ में एक अजीब-सा संतोष था। वह आगे बोला, “आज जहाँ भी जा रहा हूँ, लोग मुझे देखकर ऐसे चौंकते हैं जैसे कोई देवदूत आ गया हो। सब यही समझ रहे थे कि राखी दो-तीन दिन बाद मिलेगी। कोई मुझे मिठाई खिला रहा है, तो कोई सिर पर हाथ रखकर दुआएँ दे रहा है। आज पहली बार लगा भईया, कि बिना बहन के भी मैं इतने सारे धागों का पहरेदार हूँ।”
रतन का हृदय भर आया। जिस राखी का वो इतनी बेसब्री से इंतज़ार कर रहा था, उसे सही वक्त पर पाकर उसकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। उसे कूरियर वाले उस लड़के के रूप में एक निस्वार्थ भावना नज़र आई। रतन ने तुरंत अंदर से मिठाई लाकर उसे खिलाई और बड़े प्रेम से कहा, “दोस्त, आज का लंच तुम हमारे साथ ही करोगे। घर में खास दाल-बाटी-चूरमा बना है।”
उस दिन, रतन को अपनी कलाई पर सजे रेशम के उन धागों में न सिर्फ अपनी बहन के प्यार और स्नेह की गर्माहट महसूस हुई, बल्कि एक अंजान इंसान की नेकी ने उस त्योहार को हमेशा के लिए यादगार बना दिया।
सच्ची घटना पर आधारित एक कृति

