Story – अगला अध्याय

हाल ही में मैंने दैनिक भास्कर समाचार पत्र में यह लेख पढ़ा, जिसने मुझे गहराई से प्रभावित किया। आज मैं अपने सभी सुधि मित्रों और पाठकों के साथ इस खूबसूरत विचार को साझा कर रहा हूँ, ताकि यह हम सभी को जीवन के एक नए मोड़ पर एक सकारात्मक और नई दिशा दे सके।

सौजन्य: एन. रघुरामन (मैनेजमेंट गुरु, raghu@dbcorp.in)

वे दिन याद कीजिए जब आपका बच्चा बस किसी चीज़ की ओर उंगली उठा देता था, और आप अपनी छोटी-छोटी ज़रूरतों को टालकर या थोड़ी-बहुत बचत करके उसकी हर इच्छा पूरी करने का मार्ग निकाल लेती थीं। वे रातें याद कीजिए जब बच्चे का शरीर बुखार से तप रहा होता था और आप बिना पलक झपकाए रात भर उसके माथे पर ठंडी पट्टियां बदलती रहती थीं। या फिर वह पड़ाव, जब उसने विदेश में अपने पहले आशियाने के लिए डाउन पेमेंट की बात की, और आपने बिना झिझक अपनी वर्षों की जमा पूंजी यह सोचकर सौंप दी कि “आखिर हमारे बाद यह सब उसी का तो है।”

फिर एक दिन, धीरे-धीरे सब बदल जाता है।

आप बार-बार अपने मोबाइल फोन की स्क्रीन को देखती हैं। वही फोन, जो कभी बच्चे की छोटी-बड़ी बातों से बजता रहता था, अब अक्सर खामोश पड़ा रहता है। यह खामोशी रिश्ते में किसी दूरी या कम होते प्रेम की वजह से नहीं है, बल्कि इसलिए है क्योंकि आपका बच्चा अब बड़ा हो गया है। वह एक जिम्मेदार वयस्क है—अपनी नौकरी, बैठकों, परिवार और बच्चों के बीच व्यस्त।

परंतु, कई माता-पिता जीवन के इस स्वाभाविक बदलाव को स्वीकार करने में थोड़ा समय लगा देते हैं। ऐसे में वही खामोश फोन एक खालीपन का अहसास कराने लगता है। जो मां दशकों तक हर दोपहर पूछती रही कि “खाना खाया?”, वह अब किसी के द्वारा वही सवाल खुद से पूछे जाने का इंतजार करती है। जो पिता कभी बच्चे के काम के लिए पूरे शहर के चक्कर लगा लेते थे, वे अब अपनी शारीरिक तकलीफ बताने में भी झिझकते हैं।

जब माता-पिता के रूप में बिताए गए दशकों के बाद यह सवाल मन में उठता है कि—“जब अब किसी को मेरी वैसी आवश्यकता नहीं है, तो मेरी अपनी पहचान क्या है?”—तब एक अनजाना अकेलापन घेर लेता है।

आधी रात की एक किलकारी से शुरू हुआ यह सफर—स्कूल यूनिफॉर्म, लंच बॉक्स, बुखार, परीक्षाएं, पहली नौकरी और शादी जैसे अनगिनत पड़ावों से होकर गुजरा था। माता-पिता को बच्चे की पसंद की हर डिश, उसकी हर दवा और उसके “मैं ठीक हूं” के पीछे छिपी असली भावना का अहसास रहता है।

यह बात वास्तविक जीवन पर भी उतनी ही सटीक बैठती है। जब बच्चे अपनी राह पर आगे बढ़ जाते हैं, तो कई माएं और पिता अचानक उस उद्देश्य को खोया हुआ महसूस करते हैं, जिसके इर्द-गिर्द उनकी पूरी जिंदगी घूमती रही। दुखद पहलू यह भी है कि बच्चे मदद करना चाहते हैं, लेकिन माता-पिता स्वयं अपनी जरूरतें व्यक्त नहीं कर पाते।

जीवन का दूसरा अध्याय: नई पहचान की ओर

बच्चों का हमेशा हमारे जीवन का एकमात्र केंद्र बने रहना संभव नहीं है। उन्हें अपना जीवन जीना है और अपने ध्येय पूरे करने हैं। इसलिए, हर माता-पिता के लिए यह आवश्यक है कि वे अपने जीवन का एक दूसरा प्रयोजन (Next Purpose) भी तलाशें:

  • अपनी अलग पहचान बनाएं: उन रुचियों या शौक को फिर से जगाएं, जिन्हें आपने परिवार की जिम्मेदारियों के चलते वर्षों तक टाल दिया था।
  • खुद के लिए समय निकालें: बच्चों की प्रतीक्षा किए बिना नई जगहें घूमें, सामाजिक कार्यों से जुड़ें या कुछ नया सीखें।
  • बदलाव की पूर्व-तैयारी: सबसे बेहतर यही होगा कि यह दूसरा उद्देश्य बच्चों के घर से दूर जाने से पहले ही आपके जीवन का हिस्सा बन जाए।

एक विचारणीय बात –
बच्चों को पंख देकर उड़ना सिखाना तो हमारा फर्ज था, जो हमने बखूबी निभाया। पर जब वे अपनी उड़ान पर निकल जाएं, तो अपनी अधूरी ख्वाहिशों को भूला देना सही नहीं। यह समय अकेले उदास बैठने का नहीं, बल्कि सालों से छूटे अपने सपनों को समेटने और जिंदगी को एक नए मोड़ पर मुस्कुराकर गले लगाने का है।

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