Story – एक मैदान, दो दौड़

मैराथन खत्म हो चुकी थी। फिनिशिंग लाइन पर जश्न का माहौल था। हज़ारों लोग गले में चमकते हुए मेडल लटकाए, हाथ में एनर्जी ड्रिंक और रिफ्रेशमेंट के पैकेट लिए अपनी जीत की सेल्फी ले रहे थे। मैं भी उनमें से एक था। फिटनेस का जुनून हवा में तैर रहा था।

तभी मेरी नज़र एक फटेहाल महिला पर पड़ी। वह मैराथन का हिस्सा नहीं थी, पर वह भी दौड़ रही थी—एक खाली बोतल से दूसरी बोतल की ओर। उसके लिए यह रेस ‘किलोमीटर’ की नहीं, ‘किलोग्राम’ की थी।

उसे एक कोने में ढेर सारी प्लास्टिक की बोतलें और कचरा दिखा। उसने तुरंत अपनी फटी हुई जेब से एक पुराना मोबाइल निकाला और किसी को फोन लगाया। उसकी आवाज़ में एक अजीब सी उत्तेजना और खुशी थी – “अरी ओ शांति! जल्दी आ जा यहाँ अजमेरी गेट के पास। बहुत माल बिखरा पड़ा है। हज़ारों बोतलें हैं… तू भी आ जाएगी तो जल्दी बटोर लेंगे। आज शाम तक अच्छा पैसा बन जाएगा, बच्चों के लिए भरपेट राशन आ जाएगा। जल्दी आ, कहीं कोई और न आ जाए!”

उसके चेहरे पर वह चमक थी, जो शायद मेडल जीतने वाले धावक के चेहरे पर भी नहीं थी। धावक अपनी ‘कैलोरी’ घटाकर खुश थे, और वह अपने शाम के ‘निवाले’ का इंतज़ाम होते देख खुश थी।

मैराथन की वह चमकदार धातु का मेडल उस महिला की आँखों की चमक के आगे फीका पड़ गया। हम फिट तो हो रहे हैं, लेकिन क्या हमारा समाज ‘स्वस्थ’ हो रहा है? जहाँ एक का कचरा दूसरे का खज़ाना बन जाए, वहाँ प्रगति की परिभाषा पर दोबारा विचार करने की ज़रूरत है।

Scroll to Top